किसान नहीं पूंजीपति हितैषी है कृषि अध्यादेश – Hawasingh Sangwan


पूर्व कमाडेंट हवासिंह सांगवान
मो.न० 94160 56145

हाल ही में सरकार तीन नए कृषि अध्यादेश लेकर आई है । इनमें जो सबसे पहली अहम् बात है वह यह है कि पहले हर व्यापारी केवल मंडी से ही फसल खरीद सकता था परन्तु अब व्यापारी को इन नए अध्यादेश के तहत मंडी के बाहर से फसल खरीदने की छूट दी गई है । कहने का अर्थ है कि सर छोटूराम ने किसान के हित के लिए सन 1938 में “ पंजाब कृषि उत्पाद मंडी अधिनियम -1938” बनाया था उसे यह सरकार एक तरह से समाप्त कर रही है और एमएसपी से पीछा छुड़ाना चाहती है ।

एक कमीशन की रिपोर्ट अनुसार किसानों को अपनी फसल का मूल्य एक रूपये में से 60 पैसे ही मिल पाता था तथा अनेक कटौतियों का सामना किसानों को करना पड़ता था , जैसे कि आढत , तुलाई , रोलाई , मुनीमी , पल्लेदारी और भी कई तरह कटौतिया होती थी । सर छोटूराम द्वारा बनाए इस अधिनियम के तहत किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य दिलवाने का नियम बना । आढ़तियों के शोषण से किसानों को निजात इसी अधिनियम ने दिलवाई ।

अब समझने की बात यह है कि सर छोटूराम को यह मंडी एक्ट क्यों बनवाना पड़ा था ! और अब ऐसा क्या सुधार या जाग्रति आ गई कि सरकार सर छोटूराम के बनवाए मंडी एक्ट में संसोधन कर , व्यापारियों को मंडी से बाहर खरीद की छूट के लिए ये अध्यादेश लेकर आई है ? और सबसे बड़ा भ्रामक प्रचार जो इस सरकार के समर्थक कर रहें हैं वह यह कि किसान को अपनी फसल बेचने की छूट मिली है । जबकि वास्तविकता ये है कि किसान को अपनी फसल बेचने की छूट नहीं बल्कि व्यापारी को किसान की फसल की लूट की छूट दी है । जो व्यापारी पहले मंडी तक सिमित था उसको अब मंडी से बाहर खरीद की छूट दी है ।

ऐसा नहीं है कि पहले व्यापारी मंडी से बाहर फसल नहीं ख़रीदा करते थे । पहले भी ख़रीदा करते थे । मैंने खुद कभी भी मंडी में जाकर फसल नहीं बेचीं । उसका कारण था कि एक तो मंडी में अपनी फसल की बोली की बारी का इंतजार करो और इस दौरान मौसम ख़राब हो जाए तो बारी के इंतजार में मंडी में पड़ी फसल ख़राब होने का डर अलग । और दूसरा सबसे मुख्य कारण ये था कि मंडी में फसल ले भी जाते तो एमएसपी से ऊपर तो दूर की बात सरकार द्वारा निर्धारित एमएसपी भी नहीं मिलता था , जो आज भी ऐसा ही है । तो इससे बेहतर यही था कि मंडी से बाहर गाँव में ही बनियों को अपनी फसल बेच देता था ।

सर छोटूराम ने मंडी एक्ट बनाया और किसान की फसल को उचित मूल्य मिले इसके प्रावधान किये । उनके समय यह था कि किसान को लाभकारी समर्थन मूल्य मिले परन्तु उनके बाद आजाद भारत की सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम्एसपी) पर आ गई , और वह भी सिर्फ कागजों तक सिमित रह गया | सर छोटूराम के बाद की सरकारें तो किसान की फसल को एमएसपी पर भी नहीं खरीद/बिकवा पाई | दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने ‘मुख्यमंत्री किसान मित्र योजना’ के तहत गेहूं का 2616/- रूपये प्रति क्विंटल एमएसपी घोषित किया था और दावा किया था कि इस योजना के तहत दिल्ली के बीस हजार किसानों को फायदा पहुंचेगा । पर जब फसल पक कर मंडी में आई तो सिर्फ 6 ही किसानों यह एमसीपी मिल पाया , बाकी के किसानों का गेहूं 1650/- से 1750/- प्रति क्विंटल के भाव बिका , जोकि केंद्र सरकार द्वारा घोषित 1925/- एमएसपी से भी नीचे था |ल्। किसानों ने शिकायत भी की परन्तु दिल्ली सरकार इसका कोई समाधान नहीं कर पाई । जब राज्य या केंद्र की सरकारें किसान को सरकार द्वारा तय एमएसपी ही नहीं दिलवा पाती हैं तो फिर केंद्र की सरकार इन अध्यादेश के तहत यह दावा किस आधार पर कर सकती है कि मुक्त बाजार नीति से किसान को उसकी फसल का उचित भाव मिल सकेगा ?

इन्हीं नए अध्यादेश में सरकार ने मुक्त बाजार की घोषणा करते हुए कहा है कि अब देश का किसान देश के किसी भी राज्य में अपनी फसल बेच सकेगा । 2015-16 फार्म सेन्सस की रिपोर्ट अनुसार हमारे देश में 86.2% किसान ऐसे हैं जिनके पास दस एकड़ या इससे भी कम कृषि भूमि है । अब सवाल यह है कि इतनी छोटी जोत का किसान अपनी फसल तमिलनाडु बेचने ले जा पाएगा ? हमें पता है नहीं ले जा पाएगा | तो फिर यह मुक्त बाजार नीति से किन्हें मुनाफा होगा ?

नए अध्यादेश में कहा गया है कि यदि किसान और खरीददार के बीच उनके कॉन्ट्रैक्ट को लेकर कोई विवाद हो जाता है तो इसके लिए किसान एसडीएम् या डिएम के पास विवाद निपटारे के लिए शिकायत कर सकता है और एसडीएम् , डिएम को यह विवाद महीना भर में निपटाना होगा । अब इसमें सवाल यह है कि कोर्ट की बजाए सरकार ने एसडीएम् व् डीएम को ही क्यों निर्धारित किया ? एसडीएम् या डीएम् राज्य सरकार के अधीन काम करते हैं और क्या सरकार पूंजीपतियों के दबाव में इन पर खरीददार के हक़ में फैसला देने का दबाव नहीं डाल सकती ?

हमारे प्रधानमंत्री जी यूएस-इंडिया बिज़नस कौंसिल द्वारा आयोजित कार्यक्रम में अमेरिका की कंपनियों को आत्मनिर्भर भारत में निवेश के लिए आमंत्रित कर रहे थे । प्रधान मंत्री ने कहा कि सरकार द्वारा किए गए कृषि सुधारों से व्यापार में आसानी होगी और घोषणा की कि खाद्य प्रसंस्करण उद्योग “2025 तक आधा ट्रिलियन डॉलर से अधिक होने की उम्मीद है”। अब इससे हम यह खेल समझ सकते हैं कि इन अध्यादेशों से किसकी आमदनी दुगनी होगी ? अमेरिका जैसा देश जो अपने किसान को इतनी भारी सब्सिडी देता है , और इस सब्सिडी का खेल हमने कपास के मामले देखा ही है कि कैसे अमेरिका ने अपने कपास किसानों को भारी सब्सिडी देकर अफ्रीकन गरीब देशों के किसानों को तबाह कर दिया था । यह तो सिर्फ एक मामले का उदाहरण है , अमेरिका के ऐसे अनेकों उदारहण जिसमें इन्होनें विकाशील देशों के किसानों को अपना उत्पाद कोडियों के दाम पर बेचने को मजबूर कर दिया था ।

इन कुछ मोटा-मोटी बातों से हम सहज ही अंदाजा लगा सकते है कि सरकार ये नए अध्यादेश किनके मुनाफे के लिए लाई है ! सरकार अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है , वह सर छोटूराम के बनाए कानूनों को सख्ती से लागू करने के बजाए अमेरिका और WTO के इशारे पर काम करने को मजबूर है और देश के किसान का इस तरफ ध्यान न जाए इसके लिए देश के किसान को 2022 में आमदनी दुगनी करने का झुनझुना पकड़ा रखा है । सरकार की आमदनी दुगनी की बात अच्छी है पर पहले वह यह तो बताएं कि किसान की आमदनी है कितनी ? इन नए अध्यादेशों से पहले प्रधानमंत्री जी ने किसान को फसल बिमा योजना का झुनझुना पकडाया था । झुनझुना इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि एक आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार बिमा कंपनियों ने 2019-20 के रबी सीजन के फसल बिमा मुआवजे का अबतक सिर्फ 20% ही भुगतान किया गया है , यानी 3,750 करोड़ में से सिर्फ 775 करोड़ का ही भुगतान किया गया है ।

सो यह स्पष्ट है कि सरकार किसान हितैषी नहीं सिर्फ पूंजीपतियों की हितैषी है , ये तीनों नए कृषि अध्यादेश सिर्फ पूंजीपतियों के हित को ध्यान में रख कर लाये गए हैं । ये तीन नए कृषि अध्यादेश किसान को दही के भुलामे (धोखे में) कपास खिलाने जैसा काम है । ऐसा करके सरकार किसान को वापिस से सन 1938 से पहले के दौर में ले जाना चाहती है जिससे सर छोटूराम किसान को निकाल कर लाये थे ।

अब जीना और मरना हमारे हाथ में है , यदि हम जीना चाहते हैं तो हमको सीधा इन काले अध्यादेशों का पुरजोर विरोध करना है और सरकार को इन अध्यादेशों को वापिस लेने पर मजबूर कर देना है , यही एक रास्ता है ।

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